‘आदिवर्त : जनजातीय एवं लोक कला राज्य संग्रहालय’ का लोकार्पण एवं राज्य शिखर सम्मान अलंकरण समारोह

Start Date: Wednesday, 22 February 2023 - End Date: Wednesday, 22 February 2023
Start Time: 7:30 PM - End Time: 11:00 PM
कार्यक्रम का स्थान: आदिवर्त जनजातीय एवं लोक कला संग्रहालय
कलाकार: अश्विनी कुमार दुबे
प्रवेश: Free
संस्कृति संचालनालय
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*विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो में मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा परिकल्पित ‘आदिवर्त : जनजातीय एवं लोक कला राज्य संग्रहालय’ का लोकार्पण एवं राज्य शिखर सम्मान अलंकरण समारोह का आयोजन 22 फरवरी को* राज्य शिखर सम्मान अलंकरण समारोह - मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग का प्रतिष्ठित राज्य शिखर सम्मान अलंकरण समारोह का आयोजन आदिवर्त जनजातीय एवं लोककला राज्य संग्रहालय, खजुराहो में 22 फरवरी, 2023 को सायं 6 बजे से आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर राज्य शिखर सम्मान (हिन्दी साहित्य) वर्ष-2021 अश्विनी कुमार दुबे, इंदौर, राज्य शिखर सम्मान (उर्दू साहित्य) वर्ष-2021 डाॅ. नरेन्द्र वीरमणि, इंदौर, राज्य शिखर सम्मान (संस्कृत साहित्य) वर्ष-2021 डाॅ. भगवतीलाल राजपुरोहित, उज्जैन, राज्य शिखर सम्मान (शास्त्रीय संगीत) वर्ष-2021 पण्डित श्रीधर व्यास, उज्जैन, राज्य शिखर सम्मान (शास्त्रीय नृत्य) वर्ष-2021 डाॅ. विजया शर्मा, भोपाल, राज्य शिखर सम्मान (रूपंकर कलाएं) वर्ष-2021 अनिल कुमार, भोपाल, राज्य शिखर सम्मान (नाटक) वर्ष-2021 प्रशांत खिरवड़कर, भोपाल, राज्य शिखर सम्मान (जनजातीय एवं लोक कलाएं) वर्ष-2021 सावनी बाई, डिण्डोरी, राज्य शिखर सम्मान (दुर्लभ वाद्ययंत्र) वर्ष-2021 मुन्ने खां, भोपाल को प्रदान किया जावेगा। आदिवर्त संग्रहालय - मध्यप्रदेश की प्रमुख जनजातियों के सृष्टि मिथकों में कुछ जीव-जन्तुओं का जिक्र बार-बार आता है। चार सृष्टि कथाओं में धरती की खोज करने की जिम्मेदारी कौवे को ही सौंपी गई। इन मिथकों में संसार की सृष्टि शून्य से शुरू नहीं होती। धरती, सूरज, चाँद बनने के पहले भी जल और जल के जीव जैसे केकड़ा, कछुआ, सर्प, केंचुआ आदि मौजूद थे। पाताल में चली गई धरती केंचुए के पास थी। सर्प, कछुए और केकड़े ने उसे वापस लाने में मदद की और फिर मकड़ी द्वारा पानी की सतह पर बुने गये जाल पर धरती को छबाया गया। गोण्ड कलाकारों द्वारा तीन वृक्षों के तनों पर मिथकीय अभिप्रायों को उकेरकर बनाया संग्रहालय का यह प्रवेश द्वार आदिवासी समाजों के जीवन की निरन्तरता के प्रतीकों से सुसज्जित है। जंगल में रहने वाले बाघदेव भी सब जनजातियों में पूजनीय हैं, इसलिये बाघ का मुख भी यहां उकेरा गया है।

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